देहरादून: उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा आयोजित विश्व आपदा प्रबंधन शिखर सम्मेलन और 20वां उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन का दूसरा दिन कई महत्वपूर्ण शोध कार्यों और तकनीकी चर्चाओं के नाम रहा। कार्यक्रम का आयोजन ग्राफिक एरा डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी में किया गया, जिसमें देश-विदेश से आए शोधार्थियों, वैज्ञानिकों, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने व्यापक सहभागिता की।
सम्मेलन में बीस से अधिक तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें आपदा जोखिम न्यूनीकरण, पर्यावरणीय परिवर्तन, स्वास्थ्य, जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि, सामुदायिक विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जल संसाधन प्रबंधन और हिमालयी इकोसिस्टम सहित विभिन्न विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। आयोजकों ने बताया कि 500 से अधिक शोधार्थियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए, जो सम्मेलन की शैक्षणिक व्यापकता को दर्शाता है।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक समुदाय को एक साझा मंच प्रदान करना और साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को प्रोत्साहित करना है। विशेषज्ञों ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान आज आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी प्रगति को समझने का सबसे प्रभावी साधन बन चुका है।
वॉटर कॉन्क्लेव में हिमालयी जलवायु पर चर्चा
कार्यक्रम के तहत वॉटर कॉन्क्लेव भी आयोजित किया गया, जिसमें नदी-तंत्र, हिमालयी ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव, मानसूनी पैटर्न, जल शासन और अवैध खनन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई।
प्रो. राजीव सिन्हा, डॉ. राघवन कृष्णन, प्रो. अनिल कुलकर्णी और डॉ. अरविंद कुमार ने अपने प्रस्तुतिकरण में बताया कि हिमालय में तेज़ी से हो रहे तापीय परिवर्तन भविष्य में जल संकट को बढ़ा सकते हैं।
एक अन्य विशेषज्ञ ने बताया, “हिमालयी ग्लेशियरों में वर्ष दर वर्ष तेज़ पिघलाव दिख रहा है। यह न केवल नदी-प्रवाह को प्रभावित कर रहा है बल्कि पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाओं को भी बढ़ाता है।”
सत्र में उत्तराखंड के हालिया आपदाओं का भी उल्लेख किया गया। पिछले कुछ वर्षों में जोशीमठ भू-धंसाव, उत्तरकाशी-उत्तर पर्वतीय क्षेत्रों में बादल-फटना, केदारघाटी में बाढ़ जैसी घटनाओं ने राज्य की संवेदनशीलता को उजागर किया है। विशेषज्ञों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के साथ-साथ स्थानीय ज्ञान, प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक अनुसंधान को जोड़कर समाधान तैयार करने होंगे।
आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका पर विशेष सत्र
सम्मेलन में मीडिया की भूमिका को लेकर एक विशेष सत्र आयोजित हुआ। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने दूरदराज़ क्षेत्रों में आपदा कवरेज की चुनौतियों, भ्रामक सूचनाओं की रोकथाम, साइंटिफिक रिपोर्टिंग और सूचना-साझाकरण के प्रभाव पर विचार साझा किए।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “आपदा के दौरान समय पर और सटीक सूचना कई बार जीवन बचा सकती है। मीडिया और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।”
टेक्नोलॉजी-आधारित समाधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
सम्मेलन के दौरान आयोजित 12 विशेष टेक्नोलॉजी सत्रों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, कार्बन क्रेडिट इकोसिस्टम, सतत वित्तपोषण, ट्राइबल कम्युनिटी विकास और हिमालयी कॉरिडोर की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
आईएएस अधिकारी मीनाक्षी सुन्दरम ने जोर देते हुए कहा,
“विज्ञान और प्रशासन का समन्वय ही आपदा प्रबंधन के भविष्य को सुरक्षित बनाएगा।”
समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण पर बल
विशेषज्ञों ने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल तकनीकी विषय नहीं है, बल्कि यह समाज और संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है। समुदायों को प्रशिक्षित करना, स्थानीय स्तर पर योजनाएँ बनाना और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है।
कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक शोध, तकनीकी नवाचार और प्रशासनिक तत्परता तीनों ही स्तंभ हैं। आयोजकों का कहना है कि सम्मेलन से प्राप्त सुझाव आगामी नीतिगत सुधारों में शामिल किए जाएंगे ताकि राज्य प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अधिक सक्षम हो सके।






