नई दिल्ली: ग्रामीण भारत के समग्र विकास और रोजगार सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को लोक सभा में ‘विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण): जी राम जी विधेयक, २०२५’ (ग्रामीण रोजगार गारंटी विधेयक २०२५) प्रस्तुत किया। यह विधेयक विकसित भारत @२०४७ के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, आधारभूत ढांचे और आजीविका के अवसरों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से लाया गया है।
इस विधेयक के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों के उन वयस्क सदस्यों को, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हैं, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में १२५ दिनों के मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी प्रदान की जाएगी। यह प्रावधान ग्रामीण परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देने के साथ-साथ आजीविका के स्थायी साधनों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है।
अपने वक्तव्य में केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह विधेयक ग्रामीण भारत को भविष्य के लिए तैयार करने वाला है। उन्होंने कहा, “ग्रामीण विकास केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। यह सशक्तिकरण, समावेशन, संसाधनों के समुचित उपयोग और अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का माध्यम है।”
सूत्रों के अनुसार, विधेयक का मुख्य उद्देश्य एक कनवर्जेंस और सेचुरेशन आधारित ग्रामीण विकास ढांचा स्थापित करना है, जिसमें केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की सभी योजनाओं को एकीकृत किया जाएगा। इसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर ‘विकसित ग्राम पंचायत योजना’ तैयार की जाएगी, जिसे पीएम गति शक्ति ढांचे से जोड़ा जाएगा। इन योजनाओं को ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर समेकित कर एक समग्र ग्रामीण विकास रणनीति बनाई जाएगी।
विधेयक के तहत ग्रामीण सार्वजनिक कार्यों के लिए ‘विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ की परिकल्पना की गई है। इसके अंतर्गत जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़े कार्य तथा आपदा न्यूनीकरण से संबंधित परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे देशभर में टिकाऊ, उत्पादक और जलवायु-अनुकूल ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्यों के दौरान श्रमिकों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए विधेयक में विशेष प्रावधान किया गया है। राज्य सरकारों को अधिकार दिया गया है कि वे एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम ६० दिनों की अवधि पूर्व अधिसूचना के माध्यम से निर्धारित कर सकें, जिनमें इस योजना के अंतर्गत कार्य नहीं कराए जाएंगे। इसका उद्देश्य बुवाई और कटाई के चरम मौसम में खेतिहर श्रमिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
वित्तीय व्यवस्था के तहत यह योजना केंद्रीय प्रायोजित योजना के रूप में लागू की जाएगी। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के लिए ९०:१० का फंड शेयरिंग पैटर्न निर्धारित किया गया है, जबकि अन्य राज्यों के लिए ६०:४० का अनुपात लागू होगा। राज्यों को अधिनियम लागू होने की तिथि से छह माह के भीतर कार्यान्वयन योजना तैयार करना अनिवार्य होगा।
विधेयक में पारदर्शिता और जवाबदेही पर विशेष जोर दिया गया है। इसके अंतर्गत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना आधारित शासन ढांचे की व्यवस्था की गई है, जिसमें बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, स्थानिक प्रौद्योगिकी आधारित योजना निर्माण और निगरानी, मोबाइल आधारित रिपोर्टिंग, रियल टाइम डैशबोर्ड, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण और सुदृढ़ सामाजिक अंकेक्षण प्रणाली शामिल है।
इसके अतिरिक्त, ग्राम पंचायत भवनों में कार्यों की स्थिति, भुगतान विवरण, शिकायतों की स्थिति, मस्टर रोल और प्रगति रिपोर्ट को लेकर साप्ताहिक सार्वजनिक जानकारी बैठकें आयोजित की जाएंगी। यह जानकारी भौतिक और डिजिटल दोनों माध्यमों से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएगी।
विधेयक के अनुसार मजदूरी दरें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित की जाएंगी। जब तक नई दरें लागू नहीं होतीं, तब तक महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत प्रचलित मजदूरी दरें ही लागू रहेंगी। यदि १५ दिनों के भीतर रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित दरों पर बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में ग्रामीण भारत में संपर्क, आवास, पेयजल, स्वच्छता, विद्युतीकरण और डिजिटल पहुंच में व्यापक सुधार हुआ है। बदलती आकांक्षाओं और जलवायु चुनौतियों को देखते हुए सरकार का मानना है कि रोजगार गारंटी को १०० दिनों से बढ़ाकर १२५ दिन करना समय की आवश्यकता है।
सरकार का कहना है कि यह विधेयक ग्रामीण कार्यबल को अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने, असमानताओं को कम करने और विकसित भारत @२०४७ के लक्ष्य को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।






