उत्तराखंड राज्य स्थापना की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विधानसभा के विशेष सत्र में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। कांग्रेस विधायक एवं उपनेता प्रतिपक्ष भुवन चंद्र कापड़ी ने सदन में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विधायक निधि के आवंटन में 15 प्रतिशत तक कमीशन लिया जा रहा है, जिससे विकास योजनाओं का वास्तविक लाभ जनता तक नहीं पहुंच पा रहा है।
हमारे संवाददाता बताते हैं कि कापड़ी ने यह बयान सदन में पारदर्शिता और सुशासन पर चर्चा के दौरान दिया। उन्होंने कहा कि “पारदर्शिता के दावे केवल भाषणों में हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी होती जा रही हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि विकास योजनाओं और स्थानीय स्तर पर होने वाले कार्यों में बिना कमीशन दिए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती।
कापड़ी के इस आरोप के बाद सदन में हंगामा मच गया। सत्तारूढ़ दल के विधायकों ने तत्काल सबूत पेश करने की मांग की, जबकि कांग्रेस विधायकों ने सरकार पर भ्रष्टाचार छिपाने का आरोप लगाया। स्थिति को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष को हस्तक्षेप करना पड़ा और थोड़ी देर के लिए कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
हमारे संवाददाता जोड़ते हैं कि विपक्ष का कहना है कि यह कमीशन सिस्टम अब खुलेआम चल रहा है और ईमानदार अधिकारियों को भी इसका दबाव झेलना पड़ता है। उन्होंने कहा कि “जब विधायक निधि जैसी योजनाओं में भी कमीशनखोरी हो रही है, तब सुशासन के दावे कैसे मान लिए जाएं?”
सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। “राज्य सरकार शून्य सहनशीलता की नीति पर काम कर रही है। अगर किसी के पास ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें समिति के सामने रखा जाए,” एक मंत्री ने कहा।
विपक्ष ने सरकार पर भर्ती घोटालों, भूमि विवादों और विभागीय अनियमितताओं को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सरकार ने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के बजाय उसे संस्थागत रूप दे दिया है।
हमारे संवाददाता बताते हैं कि यह विवाद आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विपक्ष इसे जनता के बीच मुद्दा बनाने की तैयारी में है, जबकि भाजपा इसे झूठे आरोप बताकर अपनी उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधानसभा के इस विशेष सत्र का उद्देश्य राज्य की 25 वर्षों की उपलब्धियों पर चर्चा करना था, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने इस विमर्श को पूरी तरह ढक दिया। सरकार ने अपने विकास कार्यों, पर्यटन विस्तार, महिला सशक्तिकरण और निवेश उपलब्धियों का विवरण पेश किया, परंतु विपक्ष ने शासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए।
अध्यक्ष ने बाद में स्पष्ट किया कि सदन में कोई भी सदस्य प्रश्न उठा सकता है, लेकिन बिना प्रमाण किसी संस्था या अधिकारी पर सामान्य आरोप लगाना उचित नहीं। उन्होंने संकेत दिया कि विधायक निधि के उपयोग की समीक्षा सार्वजनिक लेखा समिति द्वारा की जा सकती है।
हमारे संवाददाता जोड़ते हैं कि बहस के अंत में दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया कि उत्तराखंड के अगले चरण के विकास में पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। राज्य की रजत जयंती वर्ष में यह विवाद एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि जनता को साफ-सुथरा शासन ही सर्वोत्तम श्रद्धांजलि है।






