देहरादून: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी गुरु तेग बहादुर श्रद्धांजलि कार्यक्रम के तहत पूरे राज्य में मनाए जा रहे शहीदी दिवस पर गुरु तेग बहादुर को नमन करते हुए कहा कि उनका बलिदान मानवता, साहस और आध्यात्मिक दृढ़ता का अमिट प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में गुरु तेग बहादुर के त्याग को भारतीय इतिहास की अद्वितीय धरोहर बताते हुए कहा कि उनकी शिक्षा आज भी समाज को एकता, समानता और करुणा का मार्ग दिखाती है।
हमारे संवाददाता बताते हैं कि मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि गुरु तेग बहादुर का बलिदान किसी एक धर्म या समुदाय के लिए नहीं था, बल्कि मानवाधिकार, आस्था की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए था। उन्होंने कहा कि “गुरु तेग बहादुर जी ने प्रेम, भाईचारा और समाज में सद्भाव का संदेश दिया। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अडिग रहना ही जीवन का सबसे बड़ा आदर्श है।”
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति में गुरु परंपरा और त्याग का विशेष स्थान रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जनता गुरु तेग बहादुर के आध्यात्मिक संदेशों को गहराई से आत्मसात करती है और उनके शहीदी दिवस पर पूरे राज्य में आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से लोग उनके उपदेशों को याद करते हैं।
गुरुवार को देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी, रुद्रपुर और काशीपुर स्थित गुरुद्वारों में विशेष अरदास, कीर्तन और सेवा कार्यक्रम आयोजित किए गए। कई सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने गुरु तेग बहादुर के जीवन और उनके योगदान पर गोष्ठियाँ आयोजित कीं।
मुख्यमंत्री के अनुसार, आज के समय में गुरु तेग बहादुर के आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं क्योंकि समाज को एकता, सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा, “गुरु तेग बहादुर जी ने अपने जीवन से साबित किया कि मानवता की रक्षा ही सच्ची भक्ति है। उनका बलिदान हमें प्रेरित करता है कि हम सभी मिलकर शांति और सद्भाव वाले समाज के निर्माण में योगदान दें।”
गुरु तेग बहादुर: इतिहास और शहादत का महत्व
गुरु तेग बहादुर (1621–1675) सिख धर्म के नौवें गुरु थे। उनका जीवन अदम्य साहस, आध्यात्मिक तपस्या और मानवता की रक्षा के लिए समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वे गुरु हरगोबिंद साहिब के पुत्र थे और उन्होंने बचपन से ही तप, त्याग और धर्म के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाया।
कश्मीर से दिल्ली तक का ऐतिहासिक प्रसंग
सत्रहवीं शताब्दी में कश्मीरी पंडितों को जबरन धर्मांतरण का दबाव झेलना पड़ा, तब वे रक्षा की उम्मीद लेकर गुरु तेग बहादुर के पास पहुँचे।
गुरु जी ने उनके अधिकारों, आस्था और मानवाधिकार की रक्षा के लिए अपनी शहादत को स्वीकार किया।
वे दिल्ली ले जाए गए, महीनों तक अमानवीय यातना सहन की और अंततः 1675 में चाँदनी चौक में उनका बलिदान हुआ।
उनकी शहादत ने भारत के इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा को नया स्वरूप दिया और उन्हें “हिंद की चादर” यानी हिंदुस्तान की ढाल कहा जाने लगा।
समाज में गुरु तेग बहादुर की शिक्षा का आज का महत्व
- धार्मिक स्वतंत्रता का संरक्षण
- अत्याचार के विरुद्ध नैतिक साहस
- मानवता और करुणा का संदेश
- सामाजिक समरसता और भाईचारा
उनके द्वारा रचित शबद आज भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। मुख्यमंत्री धामी ने राज्यवासियों से अपील की कि वे गुरु तेग बहादुर की शिक्षाओं को जीवन में अपनाएँ और सामाजिक सद्भाव व सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करें। राज्यभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रमों के माध्यम से उनके अमर संदेश को याद किया गया और उनकी शहादत को युगों तक प्रेरणा का स्रोत बताया गया।






