तीन दिवसीय हिमालयन कॉन्क्लेव २०२५ आज अल्मोड़ा के कोसी-कटारमल स्थित जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान (जीबीपीएनआईएचई) में शुरू हुआ।यह सम्मेलन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया है, जिसका उद्देश्य भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए वर्ष २०४७ तक एक समग्र विकास और संरक्षण रणनीति तैयार करना है। इस वर्ष का प्रमुख विषय है: “इंडियन हिमालयन रीजन २०४७: पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत सामाजिक-आर्थिक विकास।”
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालय न केवल भारत की भौगोलिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार भी है। जीबीपीएनआईएचई के कार्यकारी निदेशक इंद्र दत्त भट्ट ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों के विकास और संरक्षण में संतुलन लाना अत्यंत आवश्यक है और इसके लिए दीर्घकालिक नीति-निर्माण की जरूरत है।
कार्यक्रम में २१ सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें भूमि-जल संबंध, पर्वतीय कृषि, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, टिकाऊ आजीविका, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और क्षेत्रीय नीति-निर्माण जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि पर्वतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए ईको-टूरिज्म, हरित प्रौद्योगिकी और स्थानीय नवाचार अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं।
इस कॉन्क्लेव का उद्देश्य हिमालयी एक्शन प्लान १९९२ को वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप अद्यतन करना भी है। प्रतिभागियों ने चिंता जताई कि ग्लेशियरों का पिघलना, पलायन, भू-क्षरण और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से हल किया जाना चाहिए।
संयोजकों ने कहा कि सम्मेलन के निष्कर्ष राष्ट्रीय नीति-निर्माण में सहायक होंगे और भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए सतत विकास का एक ठोस रोडमैप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा कि वर्ष २०४७ तक के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से संतुलित रणनीति बनाना आवश्यक है।






