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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वन सीमा स्तंभों के लापता होने के मामले में नोटिस जारी

देहरादून: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लापता वन सीमा स्तंभ मामला में गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), केंद्र सरकार, राज्य सरकार और अन्य संबंधित संस्थानों को नोटिस जारी किए हैं। अदालत ने जनहित याचिका में लगाए गए उन आरोपों पर जवाब तलब किया है, जिनमें मसूरी वन प्रभाग में हजारों वन सीमा स्तंभों के रहस्यमय ढंग से लापता होने की बात कही गई है।

हमारे संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने की। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि याचिका में उठाए गए आरोप पर्यावरण संरक्षण और वन प्रशासन से जुड़े अत्यंत गंभीर मुद्दों की ओर संकेत करते हैं और इन पर सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब आवश्यक है।

याचिका में दावा किया गया है कि मसूरी वन प्रभाग में दर्ज कुल बारह हजार तीन सौ इक्कीस वन सीमा स्तंभों में से सात हजार तीन सौ पचहत्तर स्तंभ वर्तमान में जमीन पर मौजूद नहीं हैं। ये स्तंभ वन भूमि की कानूनी सीमा निर्धारित करने के लिए लगाए जाते हैं और इनके अभाव में वन क्षेत्र की पहचान अस्पष्ट हो जाती है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इन सीमा स्तंभों के लापता होने से वन भूमि पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। विशेष रूप से मसूरी और रायपुर रेंज में बड़ी संख्या में सीमा स्तंभों के गायब होने का आरोप लगाया गया है, जहां पर्यटन और रियल एस्टेट गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं।

याचिका में कहा गया, “वन सीमा स्तंभों का इतने बड़े पैमाने पर गायब होना सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं हो सकता। यह या तो गंभीर लापरवाही का परिणाम है या फिर किसी सुनियोजित कार्रवाई का संकेत देता है।” याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि इससे न केवल वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन भी प्रभावित हुआ है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि वन सीमा स्तंभ वन संरक्षण की आधारशिला हैं और इनका लापता होना प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि सीमा चिन्ह स्पष्ट न हों तो वन भूमि को संरक्षित करना लगभग असंभव हो जाता है।

हमारे संवाददाता जोड़ते हैं कि अदालत ने सीबीआई को नोटिस इसलिए जारी किया है क्योंकि याचिका में संभावित आपराधिक साजिश, भ्रष्टाचार और कुछ अधिकारियों तथा निजी हितों की मिलीभगत के आरोप लगाए गए हैं। इसके अलावा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, उत्तराखंड वन विभाग, सर्वे ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय सशक्त समिति से भी जवाब मांगा गया है।

हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को छह सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई ग्यारह फरवरी दो हजार छब्बीस को निर्धारित की गई है।

पर्यावरण कानून से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत द्वारा इतने व्यापक स्तर पर संस्थानों को नोटिस जारी करना इस बात का संकेत है कि मामला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि संभावित रूप से आपराधिक और संरचनात्मक विफलताओं से जुड़ा हो सकता है। एक वरिष्ठ पर्यावरण अधिवक्ता ने कहा, “यदि वन सीमा स्तंभ ही गायब हो जाएं, तो वन कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन संभव नहीं रह जाता।”

याचिका में यह भी मांग की गई है कि मसूरी वन प्रभाग में सभी वन सीमाओं का वैज्ञानिक और भू-संदर्भित सर्वे कराया जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि सीमा स्तंभ कहां और कैसे गायब हुए तथा उन्हें दोबारा स्थापित किया जा सके। याचिकाकर्ता का कहना है कि तकनीक आधारित सर्वेक्षण ही वन सीमाओं को पुनः स्पष्ट करने का स्थायी समाधान हो सकता है।

हमारे संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने फिलहाल मामले पर टिप्पणी करने से परहेज किया है, लेकिन यह जरूर कहा है कि आंतरिक स्तर पर स्थिति की समीक्षा की जा रही है। एक अधिकारी ने बताया, “वन भूमि की सुरक्षा विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है और यदि किसी स्तर पर चूक हुई है तो उस पर कार्रवाई की जाएगी।”

पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट की इस पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि वर्षों से वन भूमि पर हो रहे अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन स्पष्ट सीमाओं के अभाव में कार्रवाई कमजोर रही है।

यह मामला एक बार फिर पहाड़ी राज्य में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को सामने लाता है। मसूरी और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन और निर्माण गतिविधियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे वन क्षेत्रों पर अतिरिक्त खतरा उत्पन्न हो रहा है।

हमारे संवाददाता जोड़ते हैं कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला भविष्य में वन प्रशासन, भूमि प्रबंधन और पर्यावरणीय जवाबदेही से जुड़े कई बड़े निर्णयों की दिशा तय कर सकता है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और केंद्रीय एजेंसियों की भागीदारी से यह संकेत मिलता है कि वन संरक्षण से जुड़ी किसी भी लापरवाही को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा।

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